
जब कभी बैंकों के पास नकद रुपयों की कमी हो जाती है तो वह आरबीआई से लोन लेता है। रेपो रेट (Repo Rate) एक प्रकार का ब्याज दर है जिस पर आरबीआई (भारतीय रिज़र्व बैंक) व्यवसायिक बैंकों को कम समय के लिए लोन देता है।

आरबीआई बैंकों से उसकी सरकारी सिक्योरिटीज गिरवी लेता है और एक निर्धारित मूल्य पर उसे सही समय पर वापस बैंक खरीद लेते हैं। आरबीआई और बैंकों के बीच एक करार के तहत यह किया जाता है। इसी ब्याज दर को रेपो रेट के रूप में जाना जाता है। जानकारी हो कि मुद्रास्फीति (inflation) को नियंत्रित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे अर्थव्यवस्था में नकद रुपयों की कमी नहीं होती है।
आरबीआई बैंकों को दिए जानेवाले लोन के लिए ब्याज दर या रेपो रेट को तय करता है। जब आरबीआई रेपो रेट को बढ़ा देता है तो बैंक कर्ज लेने से बचते हैं। इस स्थिति में अर्थव्यवस्था में नकद रुपयों की कमी हो जाती है जिससे बैंक उपभोक्ता को कर्ज देने से बचने लगते हैं और इससे बाजार में मंदी आती है। वहीं जब आरबीआई रेपो रेट को कम कर देता है तो बैंक अधिक लोन ले पाते हैं। इसके साथ ही उपभोक्ता को भी कर्ज कम ब्याज दर पर मिलता है। लिहाजा बाजार में कैश का फ्लो बना रहता है।
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आरबीआई ने दिसंबर 2026 मे मौद्रिक नीति समीक्षा की है। इसके तहत विकास को बढ़ावा देने के लिए रेपो रेट में कटौती की गई है। लिहाजा बैंक को कम रेट पर आरबीआई से लोन मिल रहा है। इससे बैंक लोगों को आसानी से कम ब्याज दर पर आसानी से लोन देने को उत्सुक है। किसी भी अर्थव्यवस्था को इससे गति मिलती है। जानकारी के लिए बता दें कि भारत में अभी रेपो रेट 5.25% है।
अब समझते हैं कि रिवर्स रेपो रेट क्या हैं? यह वह ब्याज दर है जिसपर आरबीआई बैंकों से पैसे उधार लेती है। इससे बाजार में कैश का फ्लो कम हो जाता है। फिलहाल रिवर्स रेपो रेट 3.35% है।

रेपो रेट को निर्धारित करने के लिए आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी अलग-अलग आर्थिक संकेतों को देखती है। कमेटी महंगाई, जीडीपी ग्रोथ, कैश फ्लो और वैश्विक आर्थिक स्थिति का आकलन करते हुए निर्णय लेती है कि रेपो रेट को बढ़ाना-घटाना या फिर स्थिर रखना है।
Repo Rate =
{(Repurchase Price – Original Selling Price) / Original Selling Price)} × (360 / n)
(n = छुट्टियों वाले दिनों की संख्या)
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इस प्रकार, रेपो रेट भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं।
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रेपो रेट के माध्यम से अर्थव्यवस्था में कैश फ्लो को नियंत्रित किया जाता हैं, वहीं ब्याज दरों को भी कम-ज्यादा किया जा सकता है। इसका उपयोग करते हुए रिज़र्व बैंक महंगाई पर कंट्रोल रखने का काम करता है। लिहाजा रेपो रेट को समझकर आप बेहतर ढ़ंग से वित्तीय निर्णय ले सकते हैं।
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रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को कम समय के लिए लोन देती है। इसे आरबीआई के मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी द्वारा नियंत्रित होता है।
रेपो रेट बढ़ने से लोन महंगा होता है और घटने से लोन सस्ता हो जाता है।
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई कम समय के लिए बैंकों को लोन देती है। वहीं बैंक दर वह ब्याज दर है जिसपर आरबीआई बैंकों को लंबे समय के लिए लोन देती है। दोनों का उद्देश्य अलग होता है।
रेपो रेट घटने से EMI कम हो सकता है। इसके बढ़ने से EMI ज्यादा हो जाता है।
रेपो रेट हर महीने नहीं बदलती है। लगभग दो महीने पर आरबीआई की एमपीसी बैठक करती है। इस बैठक में ही निर्णय लिया जा सकता है।
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