रेपो रेट क्या है? अर्थ और यह कैसे काम करता है?

जब कभी बैंकों के पास नकद रुपयों की कमी हो जाती है तो वह आरबीआई से लोन लेता है। रेपो रेट (Repo Rate) एक प्रकार का ब्याज दर है जिस पर आरबीआई (भारतीय रिज़र्व बैंक) व्यवसायिक बैंकों को कम समय के लिए लोन देता है।

आरबीआई बैंकों से उसकी सरकारी सिक्योरिटीज गिरवी लेता है और एक निर्धारित मूल्य पर उसे सही समय पर वापस बैंक खरीद लेते हैं। आरबीआई और बैंकों के बीच एक करार के तहत यह किया जाता है। इसी ब्याज दर को रेपो रेट के रूप में जाना जाता है। जानकारी हो कि मुद्रास्फीति (inflation) को नियंत्रित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे अर्थव्यवस्था में नकद रुपयों की कमी नहीं होती है।
रेपो रेट कैसे काम करता है?
आरबीआई बैंकों को दिए जानेवाले लोन के लिए ब्याज दर या रेपो रेट को तय करता है। जब आरबीआई रेपो रेट को बढ़ा देता है तो बैंक कर्ज लेने से बचते हैं। इस स्थिति में अर्थव्यवस्था में नकद रुपयों की कमी हो जाती है जिससे बैंक उपभोक्ता को कर्ज देने से बचने लगते हैं और इससे बाजार में मंदी आती है। वहीं जब आरबीआई रेपो रेट को कम कर देता है तो बैंक अधिक लोन ले पाते हैं। इसके साथ ही उपभोक्ता को भी कर्ज कम ब्याज दर पर मिलता है। लिहाजा बाजार में कैश का फ्लो बना रहता है।
भारत में मौजूदा रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या है?
आरबीआई ने दिसंबर 2026 मे मौद्रिक नीति समीक्षा की है। इसके तहत विकास को बढ़ावा देने के लिए रेपो रेट में कटौती की गई है। लिहाजा बैंक को कम रेट पर आरबीआई से लोन मिल रहा है। इससे बैंक लोगों को आसानी से कम ब्याज दर पर आसानी से लोन देने को उत्सुक है। किसी भी अर्थव्यवस्था को इससे गति मिलती है। जानकारी के लिए बता दें कि भारत में अभी रेपो रेट 5.25% है।
अब समझते हैं कि रिवर्स रेपो रेट क्या हैं? यह वह ब्याज दर है जिसपर आरबीआई बैंकों से पैसे उधार लेती है। इससे बाजार में कैश का फ्लो कम हो जाता है। फिलहाल रिवर्स रेपो रेट 3.35% है।
रेपो रेट की गणना कैसे की जाती है?

रेपो रेट को निर्धारित करने के लिए आरबीआई की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी अलग-अलग आर्थिक संकेतों को देखती है। कमेटी महंगाई, जीडीपी ग्रोथ, कैश फ्लो और वैश्विक आर्थिक स्थिति का आकलन करते हुए निर्णय लेती है कि रेपो रेट को बढ़ाना-घटाना या फिर स्थिर रखना है।
Repo Rate =
{(Repurchase Price – Original Selling Price) / Original Selling Price)} × (360 / n)
(n = छुट्टियों वाले दिनों की संख्या)
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अर्थव्यवस्था पर रेपो रेट का प्रभाव
- लोन की ब्याज दरें: अर्थव्यवस्था पर रेपो रेट का सीधा प्रभाव पड़ता है। इसके बढ़ जाने से बैंकों को आरबीआई से पैसा लेना महंगा हो जाता है। लिहाजा बैंक होम लोन, कार लोन आदि पर ब्याज की दरें बढ़ा देता है। नए लोग लोन लेने से बचने लगते हैं। फ्लोटिंग रेट पर हम लोन लेने वाले लोगों के लिए ईएमआई की राशि बढ़ जाती है। इसके विपरित जब रेपो रेट घट जाता है तो लोन सस्ते हो जाते हैं और बाजार में कैश की आमद बढ़ जाती है। बैंक सस्ते दर पर लोन देते हैं जिससे आम लोगों को सुविधा होती है।
- महंगाई नियंत्रण: रेपो रेट के माध्यम से महंगाई को नियंत्रित किया जाता है। जब बाजार में महंगाई तेजी से बढ़ने लगती है तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ा देता है। इससे बाजार में कैश की कमी होती है और लोग कम खर्च करने लगते हैं। वस्तुओं के दमा बढ़ने से मांग में कमी आ जाती है लिहाजा महंगाई पर नियंत्रण हो जाता है।
- आर्थिक विकासः रेपो रेट आर्थिक विकास को गति देने के भी काम आता है। जब रेपो रेट कम रहता है तो सस्ते लोन उपलब्ध होते हैं। लिहाजा बिजनेस और स्टार्टअप अधिक निवेश कर पाते हैं और आर्थिक गतिविधियों को बल मिलता है इसके विपरीत, रेपो रेट के बढ़ने से लोन महंगा हो जाता है, और आर्थिक विकास की गति थम जाती है।
इस प्रकार, रेपो रेट भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं।
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निष्कर्ष
रेपो रेट के माध्यम से अर्थव्यवस्था में कैश फ्लो को नियंत्रित किया जाता हैं, वहीं ब्याज दरों को भी कम-ज्यादा किया जा सकता है। इसका उपयोग करते हुए रिज़र्व बैंक महंगाई पर कंट्रोल रखने का काम करता है। लिहाजा रेपो रेट को समझकर आप बेहतर ढ़ंग से वित्तीय निर्णय ले सकते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों
रेपो रेट क्या होता है और इसे कौन नियंत्रित करता है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को कम समय के लिए लोन देती है। इसे आरबीआई के मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी द्वारा नियंत्रित होता है।
रेपो रेट बढ़ाने या कम करने का क्या अर्थ होता है?
रेपो रेट बढ़ने से लोन महंगा होता है और घटने से लोन सस्ता हो जाता है।
रेपो रेट और बैंक दर में क्या अंतर है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर आरबीआई कम समय के लिए बैंकों को लोन देती है। वहीं बैंक दर वह ब्याज दर है जिसपर आरबीआई बैंकों को लंबे समय के लिए लोन देती है। दोनों का उद्देश्य अलग होता है।
मेरी पर्सनल लोन EMI पर रेपो रेट का क्या प्रभाव होता है?
रेपो रेट घटने से EMI कम हो सकता है। इसके बढ़ने से EMI ज्यादा हो जाता है।
क्या रेपो रेट हर महीने बदलती है?
रेपो रेट हर महीने नहीं बदलती है। लगभग दो महीने पर आरबीआई की एमपीसी बैठक करती है। इस बैठक में ही निर्णय लिया जा सकता है।
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