
रिवर्स रेपो दर वह ब्याज दर जिस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, वाणिज्यिक बैंकों से उनकी अतिरिक्त नकदी जमा करने पर उसके बदले ब्याज देता है। यह रेपो रेट से अलग होता है। यह वह दर है जिस पर बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लोन लेते हैं। रिवर्स रेपो का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में पैसा कम करने के लिए किया जाता है, जबकि रेपो रेट का इस्तेमाल इसे नियंत्रित या बढ़ाने के लिए होता है।
रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों से कम समय के लिए पैसे उधार लेता है। इसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में तरलता लाने और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए होता है. किया जाता है।
रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर देश के केंद्रीय बैंक द्वारा वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक जरूरतों के लिए कर्ज दिया जाता है। यह रेट आम जनता के लिए होम, कार और पर्सनल लोन की ब्याज दरों और ईएमआई को प्रभावित करती है।
रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों से कम समय के लिए पैसे उधार लेता है। सीधे तौर पर कहें तो यह अर्थव्यवस्था में नकदी को नियंत्रित करने का एक प्रमुख माध्यम है।
रेपो रेट वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बैंकों को लोन देता है. वहीं रिवर्स रेपो रेट पर बैंक अपना पैसा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास रखते हैं। रेपो रेट बढ़ने से लोन महंगे होते हैं और मुद्रास्फीति घटती है। इसके अलावा रिवर्स रेपो रेट बढ़ने से बैंक रिजर्व बैंक ऑफ उंडिया को पैसे देते हैं, जिससे बाजार में लिक्विडिटी कम होती है और अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति नियंत्रित हो जाती है।
आपको बता दें कि फरवरी 2026 की घोषणा के मुताबिक, भारत में वर्तमान रेपो रेट 5.25 प्रतिशत और रिवर्स रेपो रेट 3.35 प्रतिशत है।
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रेपो रेट (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा बैंकों को लोन दर) और रिवर्स रेपो रेट (बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में जमा दर) भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति और नकदी प्रवाह को नियंत्रित करने का मुख्य साधन है। रेपो रेट बढ़ने से कर्ज महंगे होते हैं, जिससे खर्च और मांग कम हो जाती है। यह रेट महंगाई पर लगाम लगाती है और आर्थिक विकास को धीमी कर सकती है।
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रिवर्स रेपो रेट वह ब्याज दर, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों से पैसा उधार लेता है। इसका इस्तेमाल बाजार में नकदी के प्रवाह को नियंत्रित करने और मुद्रास्फीति को कम करने के लिए किया जाता है।
रेपो रेट का होम लोन पर सीधा और बहुत ही बड़ा प्रभाव पड़ता है। इसकी वजह है कि यह वह दर है जिस पर बैंक,रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से पैसे उधार लेता है। रेपो रेट बढ़ने पर होम लोन की ब्याज दरें और EMI (मासिक किस्त) बढ़ जाती है। इसकी वजह से कर्ज महंगा हो जाता है। इसके अलावा रेपो रेट घटने से लोन सस्ता होता है और EMI कम हो जाती है. यानी यह मुख्य रूप से फ्लोटिंग-रेट लोन पर लागू होता है।
अगर हम रेपो रेट और बैंक रेट की बात करें तो दोनों भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देने की दरें हैं। इन दोनों में मुख्य अंतर यह है कि रेपो रेट अल्पकालिक (short-term) जरूरतों के लिए कोलेटरल के साथ ली जाने वाली दर है, जबकि बैंक रेट बिना किसी कोलेटरल के दीर्घकालिक (long-term) फंड के लिए होती है।
रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) बढ़ने पर बैंक अपना अतिरिक्त पैसा सुरक्षित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास जमा करते हैं। इससे बाजार में नकदी कम हो जाती है। यह मुख्य रूप से महंगाई) को नियंत्रित करने का एक प्रमुख साधन है. इसकी वजह से लोन महंगे हो सकते हैं और बैंक जमा पर ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।
यहां हम आपको बता दें कि भारत में रेपो रेट का निर्धारण भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति द्वारा तय किया जाता है। यह समिति 6 सदस्यीय है और इसके अध्यक्ष रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर होते हैं। यह समिति द्वि-मासिक (हर दो महीने में) समीक्षा बैठक द्वारा अर्थव्यवस्था में महंगाई और लिक्विडिटी के आधार पर दरें तय करती है।
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